जाने क्यों…

कहते हैं कि बुराई का मापदंड भी अच्छाई ही तय करती है..
समझ नहीं आता हे नारी फिर तुझे ये कैसी उपाधि दी जाती है..
तुझसे जुड़ी तो हर बात यहाँ कमज़ोरी की निशानी मानी जाती है..
जाने फिर भी हर भाषा के अव्वल व्यंग्य में तुझे ही क्यों सलामी दी जाती है..

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मुस्कुराते लब

ज़हन में हमारे कितने ही एहसास हैं अंगड़ाई लेते..
धड़कन के पास वे कहीं चुपके से घर बनाते..
कभी यूँ ही फुरसत में हैं हमारे दिल को गुदगुदाते..
तभी तो बेसबब ही हमारे हैं लब मुस्कुराते..

-PV

ख़ामोशी का जाम

ग़म-ए-शायरी से करते हैं वो मेहरबान..
अपना हाल-ए-दिल फुरसत में कलम से बयान..

इश्क में किसी के तड़प रहे हैं साहिबान..
शायद अब तक हैं वो मौहतरमा इस पुजारी से अंजान..

फ़ुरकत में किसी के यूँ सह रहा उनका दिल-ए-नादान..
कि इबादत में उनके खुद को भी कर दें कुरबान..

ख़ामोशी का जाम बेसबब ही पिए आपकी ज़ुबान..
वस्ल-ए-यार के हों शायद आपकी मलक के भी अरमान..

कर भी दीजिए अपने हबीब से इस उन्स का ऐलान..
शायद ही कुछ हासिल होता करके यूँ दिल को परेशान..

-PV

सपने..

सपनों को कहाँ पता है होता..
कि वो पूरे होंगे भी या नहीं..
पलते तो हैं सबकी आँखों में..
पर साकार होते हैं सिर्फ कहीं..

किसी के जीने का सहारा हैं बनते..
तो किसी को चैन से मरने भी नहीं देते..
जहाँ लिया जन्म और जहाँ हैं पनपते..
उन नैनों को भी ये चैन से सोने नहीं देते..

मेहनत की गलियों से हैं रोज़ घुमाते..
रात भर हैं ख्वाबों की सैर कराते..
कुछ खुशियों का बलिदान तो हैं माँगते..
बदले में सफ़लता की सीढ़ी भी हैं चढ़ाते..

मेहनत के आँगन में ही हैं खिलते इसके फूल..
उनके नहीं जो थक जाए खाकर एक ही बार धूल..
इस मँत्र को गलती से भी न जाने देना भूल..
क्योंकि यही तो है सारी बातों का एक ही मूल..

हारना नहीं हो परिस्थिति चाहे कितनी भी अनुकूल..
असफलता को कभी न बनने देना अपने रास्ते का शूल..
कयोंकि काँटों की सेज़ पर ही तो है वो हमेशा सजता..
जो कहलाए राजा वो गुलाब और सबके बालों पर है फबता..

मुश्किलें चाहे जितनी भी अंगड़ाइयाँ लेती रहें..
मंजिल को और मीठा बना रहे भले वो ये कहें ना कहें..
सोचो तो सोना भी तो जितना आग में तपता है..
अंत में वो उतना ही खरा और बन जाता है..

मेहनत की मोतियों से पिरो रही हूँ मैं भी सपने..
गिरते तो हैं पर उठा लेती हूँ हैं तो वो अपने..
अब खोल दिए वो दरवाजे़ जिसपे मैंने कभी लगाया था ताला..
शायद एक दिन गूथ ही लूँ अपने सपनों का माला..

हार से न जाने कयों अब डर सा नहीं लगता..
शायद बहुत सारी पहन ली हैं मैंने..
जो पहले कहती थी इसका भार सहा नहीं जाता..
आज कहती है इससे भी है जीत सा खुशी मिलता..

बढ़ाए हैं फिर से कदम मैंने कुछ सपनों की ओर..
अब ना चलने दूँगी इस पर किसी और का जो़र..
विश्वास है एक दिन ज़रूर होगी मेरी इन रातों की भोर..
करती रहूँगी मेहनत तब तक चाहे टूट जाए इन साँसों की डोर..

-PV

हौसला

आसमानों को छूती हो फिर भी मेरे अंगने में बनाती हो अपना एक घोंसला..
हम भी तेरे अंबर में छोटा सा घर बना लेते जो होता नन्ही गौरैया तुझसा हौसला..

-PV

What the lips can't express…