जाने क्यों…

कहते हैं कि बुराई का मापदंड भी अच्छाई ही तय करती है..
समझ नहीं आता हे नारी फिर तुझे ये कैसी उपाधि दी जाती है..
तुझसे जुड़ी तो हर बात यहाँ कमज़ोरी की निशानी मानी जाती है..
जाने फिर भी हर भाषा के अव्वल व्यंग्य में तुझे ही क्यों सलामी दी जाती है..

मुस्कुराते लब

ज़हन में हमारे कितने ही एहसास हैं अंगड़ाई लेते..
धड़कन के पास वे कहीं चुपके से घर बनाते..
कभी यूँ ही फुरसत में हैं हमारे दिल को गुदगुदाते..
तभी तो बेसबब ही हमारे हैं लब मुस्कुराते..

-PV

ख़ामोशी का जाम

ग़म-ए-शायरी से करते हैं वो मेहरबान..
अपना हाल-ए-दिल फुरसत में कलम से बयान..

इश्क में किसी के तड़प रहे हैं साहिबान..
शायद अब तक हैं वो मौहतरमा इस पुजारी से अंजान..

फ़ुरकत में किसी के यूँ सह रहा उनका दिल-ए-नादान..
कि इबादत में उनके खुद को भी कर दें कुरबान..

ख़ामोशी का जाम बेसबब ही पिए आपकी ज़ुबान..
वस्ल-ए-यार के हों शायद आपकी मलक के भी अरमान..

कर भी दीजिए अपने हबीब से इस उन्स का ऐलान..
शायद ही कुछ हासिल होता करके यूँ दिल को परेशान..

-PV

A sad realization

The gaps in our fingers are sometimes not meant to be filled with others, but ourselves. Why to wait for someone to wipe your tears when the Almighty provided two hands for yourself ! Why to wait for your bestie who never turned eventually to certify your virtue and whisper the words to you, “Eventually everything will turn your way. Everything will be alright” when you were plunged in your pool of tears, heartbroken by the rocky turn of events.

I am not that much of a philosophical person but I realized the above mentioned today. I was standing in my balcony in the dusk of the evening shaking to the core while those tears rolled down my cheeks. How I wished someone with whom I could share my grief.. someone who would lend their shoulder for my tears. But I guess there is no one.. there never was…and probably there never will.  And so I clasped my own hands together, wiped off my own tears and echoed to myself, “No matter what happens I am never gonna leave you. I know what you have been through but you’ll be fine..you shall make yourself proud one day and I, like always, will be by your side that day too. I love you and will always do ! ” Finally somebody said those words to me for which I waited till eternity. She was always so close to me, how could have I not realized ! Stood like a rock by my side since my first breath and shall stay till my last. And so, I no longer felt the urge to convey my sorrows to others. Because you know what my friend, I read this wise saying somewhere, that sympathy is easy to get, jealousy you have to earn “. That is so true, isn’t it ?

-PV

सपने..

सपनों को कहाँ पता है होता..
कि वो पूरे होंगे भी या नहीं..
पलते तो हैं सबकी आँखों में..
पर साकार होते हैं सिर्फ कहीं..

किसी के जीने का सहारा हैं बनते..
तो किसी को चैन से मरने भी नहीं देते..
जहाँ लिया जन्म और जहाँ हैं पनपते..
उन नैनों को भी ये चैन से सोने नहीं देते..

मेहनत की गलियों से हैं रोज़ घुमाते..
रात भर हैं ख्वाबों की सैर कराते..
कुछ खुशियों का बलिदान तो हैं माँगते..
बदले में सफ़लता की सीढ़ी भी हैं चढ़ाते..

मेहनत के आँगन में ही हैं खिलते इसके फूल..
उनके नहीं जो थक जाए खाकर एक ही बार धूल..
इस मँत्र को गलती से भी न जाने देना भूल..
क्योंकि यही तो है सारी बातों का एक ही मूल..

हारना नहीं हो परिस्थिति चाहे कितनी भी अनुकूल..
असफलता को कभी न बनने देना अपने रास्ते का शूल..
कयोंकि काँटों की सेज़ पर ही तो है वो हमेशा सजता..
जो कहलाए राजा वो गुलाब और सबके बालों पर है फबता..

मुश्किलें चाहे जितनी भी अंगड़ाइयाँ लेती रहें..
मंजिल को और मीठा बना रहे भले वो ये कहें ना कहें..
सोचो तो सोना भी तो जितना आग में तपता है..
अंत में वो उतना ही खरा और बन जाता है..

मेहनत की मोतियों से पिरो रही हूँ मैं भी सपने..
गिरते तो हैं पर उठा लेती हूँ हैं तो वो अपने..
अब खोल दिए वो दरवाजे़ जिसपे मैंने कभी लगाया था ताला..
शायद एक दिन गूथ ही लूँ अपने सपनों का माला..

हार से न जाने कयों अब डर सा नहीं लगता..
शायद बहुत सारी पहन ली हैं मैंने..
जो पहले कहती थी इसका भार सहा नहीं जाता..
आज कहती है इससे भी है जीत सा खुशी मिलता..

बढ़ाए हैं फिर से कदम मैंने कुछ सपनों की ओर..
अब ना चलने दूँगी इस पर किसी और का जो़र..
विश्वास है एक दिन ज़रूर होगी मेरी इन रातों की भोर..
करती रहूँगी मेहनत तब तक चाहे टूट जाए इन साँसों की डोर..

-PV

What the lips can't express…